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Tuesday, 22 October 2019

Soch Parivartan

मनुष्य  भिन्न  , कला  भिन्न  
व्यक्तित्व  भिन्न  , सपने  भिन्न 

आदर्श  बना चले है अपने अपने 
हकीकत बना चले सपने अपने ?

हाथ थामे चले है जिनकी 
सोच में परिवर्तन होगा उनकी ?

दोष न उनका स्वयं अकेला
समाज ने है उन्हें धकेला 

स्वयं जुड़कर समाज कहलाया , 
किन्तु स्वयं के कारण कोई परिवर्तन लाया ? 

शिक्षा  मानसिक विकास का साधन
विद्या व्यक्तित्व का साधन ,
जरूरी यही सपने साकार करने का साधन ?

सपने चुनो कुछ ऐसे अपने 
गर्व हो जिन्हे देखकर अपने ,
                                  
परिवार में  बसी दुनिया  , दुनिया में  बसा परिवार 
 क्यों स्वयं करे सपनों पर वार ?

शिक्षा दरवाजे की चाबी 
सपने मंज़िल की साथी ,
करो साकार सपने अपने 
ताकि लोग कहें  क्या खूब थे अपने !


कविता  का  तात्पर्य : इस  कविता  के  माध्यम  से  समाज  का  ध्यान  इस  ओर  केंद्रित  किया गया  है  की  हमें  अपनों  सपनो  का  चयन  स्वयं  करना  चाहिए  तथा  समाज  हम  लोगों  से  मिलकर  ही  बनता  है  इसलिए  समाज क्या कहेगा यह सोचकर  अपने  और अपने  परिवारजनों का भविष्य  उनकी इच्छा के विरुद्ध  बनाने  में साथ  न  दे , यदि  आज आपने  उनका  साथ  दे  दिया  तो  कल  वे  कुछ  ऐसा  कर  जाएंगे  जिससे  वही  समाज अब  उनकी  तारीफें करेगा  तथा आपके  समर्थन  पर अपनी  मानसिकता में  बदलाव । मानसिकता में  बदलाव  की आज भी  काफी जरूरत  है  जो  एक-एक  सोच से बदलाव करेगी।



                                        

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